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छोड़ आए गाँव को तुम

छोड़-आए-गाँव-को-तुम

छोड़ आए गाँव को तुम, भूल आए खेत को

तुम जताते हो फ़कीरी, भूखे सिकुरे पेट को

चलिये आज लिखते हैं कुछ !! कुछ मुद्दों के लिए ! तुम्हारे likes, comments और share के बंदरबांट से थोड़े दूर के मुद्दे !

देश के 7 लाख गाँव के तरह एक सुदूर-वर्ती गाँव मे रहने वाले एक किसान “मेरे-बाबूजी ” के मुद्दे ! ये मुद्दे किसी पार्टी या दल विशेष के मुद्दे नही हैं, ये  तो हर पार्टी के manifesto और चुनावी वादों मे होते हैं लेकिन सिर्फ तब-तक, जब-तक चुनाव के अंतिम चरण ख़तम नही होते !

मेरे बाबूजी किसान हैं और कभी-कभी लगता है की “किसान” शब्द को हमारे सत्ता ने  इतना पवित्र और धार्मिक जैसा बना दिया है की इसपे सिर्फ राजनीति हो सकती है !

हर चिल्लाने वाले के तरह ‘लोहिया’ जी कब के सटक गए , कहते फिरते थे की बस “हर खेत मे पानी पहुंचा दो” !! पानी तो पहुंचा नही, तुमने गाँव ही खाली करवा दिये ! मैं अपने गाँव का हालात बताता हूँ !

खेती पूर्णतया बंद हो चुकी है, सारे बैल बिक चुके हैं ! मजदूर मिलते नही हैं और बारिस होती नही है ! कुल मिलाके गाँवों मे लोग बचे ही नही हैं ! agriculture based सारे उद्योग धंधे बंद हो गए तो घर के जवान शहर मे मिलों और फेक्ट्री मे मजदूरी करने निकल पड़े हैं !  कुछ बुड्ढे बचे हुए हैं जो चौकी बे बैठ के तास खेलते हुए दिन बिताते हैं !

सरकारी फाइलों मे गाँव का मौसम गुलाबी है

मगर वादे ये झूठे हैं, तेरा दावा किताबी है !!

ख़ैर मजदूर, किसान और गरीब के नाम पे राज़नीति करने वालों इतना याद रक्खो की एक दिन सवाल पूछे जाएंगे, तुमसे और तुम्हारे विकाश के इस मॉडेल से !

शहर के कोने मे 10 बाइ दस के कमरे मे रहने वालों जो जब अपना खुला दालान याद आएगा ! जब शुरू होगा clash तुम्हारे शहरीकरण और भीड़-करण  का, जब ये विकाश और मजदूरीकरण मे फर्क समझ जाएंगे ! तब उन्हे गाँव बुलाएगा !

एक दिन पूछेंगे वो, बोलो तेरे मुद्दे हैं क्या ??
तब मैं देखूँगा, ‘जवाब-ए-भुख’ तुम देते हो क्या !

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