युवा शक्ति: संकेत एक बदलाव का या क्षणिक संघर्ष

युवा शक्ति

कल 28 सितम्बर का दिन काफी मायनो में महत्वपूर्ण था।

कल अमर शहीद सरदार भगत सिंह की जन्मतिथि थी जिसको ले कर हमारी पूरी युवा पीढ़ी बहुत ही सचेत और सजग थी।

युवाओं का ये उत्साह देख कर साफ़ पता चलता है कि इस गांधी और नेहरू के देश के युवा आज भी अमर  शहीद सरदार भगत सिंह के बलिदान और उनके देश प्रेम को नहीं भूल पाए है।।।

कल उनकी जन्मतिथि पर जिस तरह से जगहों जगहों पर युवाओं का कार्यक्रम, धरने, और मौन सभा देख साफ़ पता चलता है हमारी आज की पीढ़ी भी सरदार भगत सिंह की तरह क्रांतिकारी बदलाव चाहती है।

फर्क इतना है सरदार भगत सिंह जी ने बदलाव चाहा अंग्रेजी हुकूमत से अपने मातृभूमि के लिए और आज की युवा पीढ़ी आज खुद अपने ही समाज की बेड़ियों में बंधे हुए है।।।

आज हमारी देश में सबसे ज्यादा युवा है, इतने युवाओ वाला एक देश आज भी आज़ादी के 70 सालों के बाद भी अपनी आज़ादी सही तरीके से नहीं ले पाया है, न हम समाज की रूढिबाड़ी और दकियानूसी खयालातों से बच पाए न अपनी गन्दी राजनीती से।।

आज भी हमारी युवा पीढ़ी काफी सारी परेशानियों से झूझ रही है, कभी लिंगभेद का खेल कभी आरक्षण का गणित।।कभी बेहतर शिक्षा तो कभी बेहतर बुनियाद।।कभी गन्दी राजनीती तो कभी गन्दी कुटनीति।

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हर बार युवा शक्ति, जोश और सोच  को कुचला जा रहा है।।

आज जिस तरह से सड़कों पर महाविद्यालयों में दफ्तरों में तो कभी सरकारी महकमे में युवा शक्ति(जोश) के साथ आये मुझे लगता ये कही न कही वो गुस्सा है जिसने युवा रगो  में उबाल भरा है और ये अब बस कहनाचाह रहे है कि  बस अब बहुत हो चूका अब हम आएंगे और बदलाव लाएंगे।।

अब देखना ये है कि क्या ये जोश लंबी लड़ाई लड़ सकती है या फिर बिच में ही कही अपना दम तोड़ देगी।

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मैं नेता नहीं हूं फिर भी अच्छी बात करूँगा बदलाव मैं अकेले ला नहीं सकता पर बदलाव की मसाल बनूँगा रास्त्रवादी नहीं फिर भी तन मन धन अर्पण कर जायूँ किसी की जान ले न पायु पर अपनी जान बलिदान कर जायूँ एक छोटी सी कोशिस है छोटी सी आशादूर कर जायूँ मातृभूमि का अन्धकार और निराशा

2 COMMENTS

    • बहुत बहुत शुक्रिया
      आपने पढ़ा और आपको पसंद आया इसके लिए बहुत बहुत धन्यबाद

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