राष्ट्रपिता बापू-कल्पनाशीलता, मिथ्या या सच!!

राष्ट्रपिता बापू

आज हम 21वि सताब्दी में पहुच चुके है, दुनिया ने काफी तरक्की कर ली है।हम अंतरिक्ष और चाँद पर पहुच चुके है पर सवाल वो नहीं है।
सवाल ये है कि क्या हमारे आने वाली पीढियां ये भरोषा कर पायेगी की इस संसार में कभी ऐसा भी हाड मांस का इंसान पैदा हुआ होगा या रहा होगा जो अपनी पूरी ज़िन्दगी लोगो के लिए लड़ता रहा, संघर्ष करता रहा और बिना किसी हथियार को उठाये, बिना किसी की हत्या किए, बिना किसी का रक्त बहाये हुए, बिना किसी हिंसा के अपनी हर जंग और संघर्ष को जीतता रहा?

ऐसा भी कभी कोई रहा होगा इस दुनिया में जिसने पूरी जिंदगी देश की सेवा में गुजार दी और फिर भी अपने समकालीन लोगो में सर्वकालिक शाक्तिशाली माना गया।

हां, मै बात कर रहा हु उसी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का।

जिनका जन्म 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के एक छोटे सी रियासत पोरबंदर में हुआ जिसके दीवान इनके पिता जी करमचंद गांधी जी हुआ करते थे, इनकी माता पुतलीबाई थी। इनकी प्राथमिक शिक्षा भारत में हुयी और उसके बाद ये वकालत शिखने साउथ अफ्रीका चले गए जहाँ ये स्वयं रंगभेद के शिकार हुए और ये रंगभेद प्रथा ने उन्हें बहुत बिचलित किया।

परंपरागत भारतीय परिधान, सदैव बैष्णव भोजन और आत्मशुद्धि के लिए लंबे उपवास इनकी पहचान बन गयी।
दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद देख इनका ह्रदय बड़ा बिचलित हुआ और इनका मन सामाजिक कार्यो की ओर झुकने लगा।
दक्षिण अफ्रीका से आने के बाद इन्होंने भारत भ्रमण किया और गरीब मजदूर और किसानों पर भारी कर और भेदभाव से ये बहुत ही आहत हुए और इन्होंने उन मजदूरों और किसानों को एकजुट कर के अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाज़ उठाई और यहाँ से उन्हें वो पहचान मिली जो तत्कालीन कद्दाबर नेताओ सुभाषचंद्र बोस, जवाहरलाल नेहरू, चंद्रशेखर आजाद से अलग करती थी।

ये भारतीय जनमानस के दिलों में बस गए।

इनके जीवन पर गोपाल कृष्ण गोखले का भी बहुत गहरा प्रभाव पड़ा और ये गुलाम भारत के दर्द को समझने लगे और उस से खुद आहात होने लगे।

बहुत ही कम उम्र में शादी, घर की जिम्मेदारी, बच्चों का लालन पोषण ये सब भी वो सहते गये बिना बिचलित हुए और बिना घुटने टेके हुए।

“चंपारण और खेड़ा सत्याग्रह की सफलता से इन्होंने अंग्रेजी हुकूमत को घुटने टेकने पर मजबूर कर के ये दिखा दिया कि बिना हिंसा के भी बुराई हारती है और अहिंसा में बहुत शक्ति होती है और सदैव सच्चाई की विजय होती है।
“खिलाफत आंदोलन” की सफलता से ये हिंदुयों और मुस्लिमो में सामान रूप से लोकप्रिय हो गए और मुस्लिमो में भी इनकी गहरी पैठ हो गयी और यही से बापू सबसे शक्तिशाली नेता बन के उभरे जिसका समाज के हर समुदाय पर प्रभाव था।
इसके बाद भारतीय जन-मानस को यकीन दिलाना की अंग्रेजी हुकूमत सिर्फ भारतीय सहयोग पर टिक्की हुयी है और अगर हम गोरो का सहयोग बंद कर दे तो उनकी नीब कमज़ोर पड़ जाएगी और यही से “असहयोग आंदोलन” की सुरुआत हुयी जो आगे चल के “स्वदेशी आंदोलन” में परिबर्तित हो गयी जिसके परिणाम स्वरुप सारे भारतियों ने अंग्रेजी बस्तुयों का परित्याग किया और स्वदेशी बस्तुयों का उपयोग प्रारंभ किया।
बहुत से अंग्रेजी स्कुल-कॉलेज बंद हुए और बहुत से भारतीय लोगो ने अपनी सरकारी नौकरियों से इस्तीफा दिया और और बहुशंख्य में भारतीय स्कुल और कॉलेज खुले, जिस से भारतियों को रोजगार मिला।
यहाँ से चरखा को विश्वव्यापी पहचान मिली और सूत की परंपरा शुरू हुई।

इन दोनों आंदोलनों ने अंग्रेजी हुकूमत की अर्थव्यवस्था की गणित बिगाड़ दी और हुकूमत की बुनियादी हिलने लगी।
“चौरी चौरा हत्याकांड” में हिंसक गतिविधीयों और “काकोरी कांड” से आहत हो बापू ने “असहयोग आंदोलन” वापस ले लिया और यहाँ से बापू को अभियुक्त बना के उनपर मुकदमा चलाया गया और उन्हें देशद्रोही करार दे कर 6 साल की कारावास की सज्जा सुनाई गई और उन्हें जेल भेज दिया गया।

इसके बाद अंग्रेजी हुकूमत के “नमक-कानून” के खिलाफ बापू के आव्हान पर पुरे जन-सैलाब का साथ आ जाना और 388 किमी की यात्रा और नमक बना के नमक कानून भंग करना और बापू की गिरफ्तारी के साथ 60 हज़ार से भी ज्यादा देशप्रेमियों का अपनी गिरफ्तारी देना काफी था अंग्रेजी-हुकूमत को अंदर तक झकझोर देने के लिए।

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बापू का 1932 में कारावास से 6 दिनों का आमरण अनसन और “पूना-पैक्ट” का लागू होना दलितों और अछुतो के जीवन सुद्धार की ओर बापू का सार्थक कदम साबित हुआ।
1933 में “हरिजन-आंदोलन” में अम्बेडर के बापू के नाराज़गी के वाबजूद भी सफल होना इसका सबूत था कि गांधी जी दलित्तों और अछूतों के समक्ष भी उतने ही लोकप्रिय थे जितना समाज के और तबको के समक्ष।
1942 में भारत छोड़ो” आंदोलन में गिराफ्तारी के दैरान बापू को उनकी पत्नी कस्तूरबा का निधन भी अपने उद्देश्य से नहीं डिगा सका और सरकार के साथ समझौते के तहत 1 लाख से भी ज्यादा भारतीय कैदियों के रिहाई के साथ ही इन्होंने भारत-छोड़ो आंदोलन वापस लिया।

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इसके बाद बापू भारत को आज़ाद होते हुए देखने के साक्षी बने और इसी प्राणप्रिये भारत का विभाजन इन्होंने अपनी आँखों से देखा। पाकिस्तान विभाजन के समय बापू के द्वारा लिया गया फैसला पाकिस्तान को आर्थिक लाभ रूपी रकम का भुगतान भारत करेगी आगे चल के मिल का पत्थर साबित हुई।
30 जनवरी 1948 को साय-कालीन प्रार्थना-सभा में साय 5.17 बजे नाथूराम गोडसे के द्वारा गोली मार जाने से इनका निधन हुआ।
इनके मृत्यु के उपरान्त भारतीय दलों और भारतीय कांग्रेस आपस में ही फुट पड़ी।

शायद बापू आज़ाद और स्वाधीन भारत को ज्यादा नहीं देख पाए परंतु आज़ादी में उनका योगदान विश्वस्मरनिये और अविश्वसनीय है।

शायद इन संसार में आगे आने वाली पीढ़ियों को जब इतिहास में गांधी जी के योगदान के बारे में बताया जाए तो शायद ही कोई भरोषा कर पाए की ऐसा भी कभी कोई हाड-मांस का बना इंसान पैदा हुआ हो या कभी रहा हो जिसने अपनी पूरी जिंदगी संघर्ष करते हुए बिता दी और अपनी हर जंग जीतता चला गया बिना कभी हथियार उठाये, बिना किसी हिंसा के, सिर्फ अपनी सच्चाई और अहिंसा के सिद्धान्तों पर चलते हुए सदैव सच्चाई को जीत दिलवाते हुए।

क्या इसे सत्य मान पायेगा कोई?

हे राम!!!!

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मैं नेता नहीं हूं फिर भी अच्छी बात करूँगा बदलाव मैं अकेले ला नहीं सकता पर बदलाव की मसाल बनूँगा रास्त्रवादी नहीं फिर भी तन मन धन अर्पण कर जायूँ किसी की जान ले न पायु पर अपनी जान बलिदान कर जायूँ एक छोटी सी कोशिस है छोटी सी आशादूर कर जायूँ मातृभूमि का अन्धकार और निराशा

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