यात्रा-वृतांत

सावन का महीना हो और गांव न जाया जाए तो मेरे लिए बड़ा विचित्र बात होगी। चंद घण्टो पहले गांव की मिट्टी को माथे से लगा के आया हूँ।हाँ उसी मिट्टी को जिसके धूलि में खेलते खेलते 18 वर्ष न जाने कैसे गुम हो गए ,पता तक नही चला। वैसे तो ग्रन्थो , महाकाव्यों, आदि में वसंत को ऋतुराज कहा गया है, पर मेरे समझ से गांव का सबसे प्रिय महीना सावन का ही महीना होता है। वो बाबा का लगाया हुआ निम , बेल, आम , पीपल और बरगद दादा सब के सब हरिआल रहते हैं , जने देखिये तने एकदम हरियर हरियर नजर आता है। कहूँ कहूँ वर्षात के ठहरल पानी तो इन हरियालिओं के बिच एकदम से हीरा जैसा चमकता है। जिसके भी दुरा दलान पर चले जाइये सर्वत्र खेती बारी के चर्चा सुने के मिल जायेगा आपको। उ ओकर खेतबा में पानी आया की न , झुनिया के मोरी तैयार न हुआ है सुने में आया है , ओकरा मजदूर न मिल रहा है रोपनी के। ओह जो अन्न हम शहर में बैठकर खाते हैं उसको उपजाने की बातें सुनना उसे देखना भी कम मनोरंजक और उत्साहवर्धक नही है। अबकी गांव में पानी आने बाला पइन जिस नदी से आता था उसमे पानी न आया है। बिच में ही सरकार के द्वारा बांध बना दिया है।इससे कोई कोई के चेहरे पर उदासी भी साफ साफ़ नजर आ रहा था। बेला , चम्पा , चमेली , गुलाब , गुलमोहर और न जाने कौन कौन फूल एकदम महादेव स्थान के वातावरण के सुगन्धित बनैले था। जैसे लग रहा था की गांव में कोई बढ़िया किसिम के इत्र छिटक दिया गया हो। गढ़ तो एकदम हरियरी से चहक रहा था और उसपर पड़ी ओस की बुँदे सुबह की लालिमा के साथ चम चम कर रही थी। छोटुआ बाबा धाम जाने के तैयारी कर रहा था , कई लोग बाबा धाम से आ भी गए थे कई घरो का बैना प्रसाद आया था मेरे घर में। मेरे पापा भी आ गए थे खूब जमके प्रसाद खाके लौटा हूँ। एक साल तक इनर्जी बनल रहे के संभावना दिखाई पड़ रहा है। और उ रमुआ तो पिकनिक बनाबे के प्लान बना रहा था बराबर जाके। शाम में किसी के घर से प्याज की बू नही आ रही थी फौरन में। मतलब गांव एकदम इ महीना में सात्विक बन जाता है।दारू तो बंदे है।सब पियक्कड़ गांजा पर काम चलाते नजर आये।सुबह सुबह मंदिर का घँटी की आवाज 7 बजे तक अनवरत आती रही। गांव के हर घर के महिलाएं शंकर भगवान को जल चढ़ाने खूब भक्ति भाव से आई। हाँ आपको गांव में इ महीना में जेतना मेहनत , भक्ति , सातविक्ता, और धर्म देखने को मिलेगा ओतना कभी नही।अमरुद भी फूल दे दिया है कोई कोई में खाने लायक फल भी लग गया है। इसी बिच एक बैल नजर आया गांव में जो अपने स्तित्व के लिए लड़ रहा है उसने कहा अब हमार तो कोई पूछ न रहलो। इ ट्रेक्टरबा हमनी के ले डूबलो।पहले जब किसी के यहां अगुआ आता था, तब उसके यहां के बैलों के संख्या तक को नजर में रखकर तिलक तय किया जाता था और आज वो बैल रो रहा था।खैर बड़ी तरसाया है इ बैलों ने भी हम गरीब परिवारों को।इसे खरीदने में खून पसीना एक करना पड़ता था तब जा के इसका खूंटा दुरा पर गड़ पाता था।अब तो 400, 500 में खेतवा आराम से जोता जाता है। तब हम बैल को आश्वसन देके चलते बने। अब बारी आया गोबर और गनौरा के ढेर का उसपर अब रेड़ जम रहा था और साँप ,बिछा के अड्डा बनल था , बड़ी करून स्वर में उसने कहा तनी हमरो पर रहम कर बाबू। पहले हमरा लोग माथा पर उठा के खेत में डालते थे जिससे उनकी उपज बढ़ती थी। पर अब तो उ बोड़बा बाला चिजबा हमनी की तवाह कर देलो। इ गनौर से भी हमको पुराना बदला असूल करना था , सो हमने बस इसको सांत्वना देते हुए सिर्फ इतना कहा की सब दिन होत न एक समाना। सुबह जब उठे थे तब कोयल , पपीहा के आवाज सुनाई दिया नही तो कभी कभी ऐ लोग भी डीजे से बैर के कारन अपना आवाज छुपा लेते हैं। अद्भुत रहता है ग्राम जीवन , चारपाई खटिया पर लेट जाइये और साफ़ आसमान को निहारिये सही कहते हैं कोई भी इतना मुफ़्त में आपके मन को हल्का नही करेगा जेतना उमड़ते , घुमड़ते बादल को देखकर आपका काम हो जायेगा।फलनमा के बेटा के शादी ठीक हो गया है। ओकर नौकरी लग गया है, उसके यहां वो स्वर्ग सिधार गयी हैं , उसका खेत खरीदाया है।उ शहर में रहता है। इस प्रकार के कई चर्चे सुनिए गांव में ।यहां सब को एक दूसरे से खूब मतलब है। सब के सब एक दूसरे में मसगुल नजर आएंगे आपको। गांजा टीम का क्या कहना स्वयं को अभी शिव के दूत कहते हुए दिखेंगे।एकदम मदमस्त हाथी की तरह ऐ दूत सावन का इंतजार में ही रहते हैं।
हम हो आए गांव से आप भी जाइये।

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मैं नचिकेता , राष्ट्रिय युवा उत्सव 2016 में बिहार का प्रतिनिधि। बाल विज्ञानं कॉंग्रेस्स , इंस्पायर अवार्ड , इग्नाइट , आदि कई प्रतियोगिता का विजेता। मैं नचिकेता , विद्यार्थी हूँ स्नातक हिंदी प्रतिष्ठा प्रथम वर्ष का साथ -साथ लेखक एवम एंकर भी हु। अखबारों और पत्रिकाओं में नित्य रूप से मेरे लेख और पत्र प्रकाशित होते है। Mob-9934599395 Email-nachiketavats1998@gmail.com

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