तू लौट कर फिर घर आई नहीं

किसी के लौट के आने की जब ख़बर आई
ख़ुशी कुछ इतनी ज़ियादा थी आंख भर आई

चमकते चांद को काली घटा ने घेर लिया
चड़ी थी चांदनी छत पर मगर उतर आई

बिछड़ने वाला बिछड़ कर अभी नहीं बिछड़ा
कदम कदम पे कोई याद उम्र भर आई

ये बदनसीबी नहीं है तो ओर फ़िर क्या है
जो सांस जुड़ने गई थी वो टूट कर आई

कुरेद लेगें अना फिर पुराने ज़ख़मों को
हमारे दर्द में कोई कमी अगर आई

मैं तो हर वक़्त तुझे ढूढंता फिरता रहा
तू ही नहीं लौट कर फिर घर आई

तेरी खातिर दुनिया से लड़े उम्र भर
ये सोच कर भी न तुझे शर्म आई

Must Read-फिर से तुझे पाने की दुआ कर रहा हूँ

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