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छह दिनों तक बिना लंग्स के कैसे जिन्दा रही ये महिला

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वाकया कनाडा का है। यहाँ के एक हॉस्पिटल में लंग्स के ट्रांसप्लांट से पहले एक मरीज को छह दिन तक बिना लंग्स के रहना पड़ा। दरअसल हुआ यूँ की 33 साल की मेलिसा सिस्टिक के लंग्स में इन्फेक्शन फैलता जा रहा था। बहुत कोशिश करने के बाद भी उन्हें कोई डोनर नहीं मिला।

नहीं था कोई और उपाय: डॉक्टरों को उसकी जान बचाने के लिए और कोई रास्ता नहीं सूझा। उन्होंने उसके शरीर से संक्रमित लंग्स को हटाने का फैसला किया। क्योंकि अगर ये उसके शरीर में कुछ और दिन रहते तो उसकी जान को खतरा हो सकता था।
लाइफ सेविंग स्पोर्ट सिस्टम से रही जिन्दा: मेलिसा सिस्टिक लंग्स के शरीर से निकाले जाने के बाद लाइफ सेविंग स्पोर्ट सिस्टम से जिन्दा रही। वो भी पूरे छह दिनों तक। डॉक्टरों का कहना है कि पूरी दुनिया में ऐसा पहली बार किया गया है। ब्लड और ऑक्सीजन इंफयूजन जारी रखने और कार्बन डाई ऑक्साइड बाहर करने के लिये एक नोवालंग लगाया गया। नोवालंग एक प्रकार का कृत्रिम लंग है। हार्ट से पूरे शरीर में ब्लड पम्प कराने के लिए एक्स्ट्रा कार्पोरियल मेम्ब्रेन आक्सिजिनेसन (इसीएमओ) लगाया गया। यह एक ऐसा सिस्टम है जो हार्ट को विपरीत परिस्थितियों में भी चलाये रखता है।

फाइब्रोसिस नाम की थी बीमारी: मेलिसा को फाइब्रोसिस नाम की एक जेनेटिक बीमारी थी। यह ऐसी जेनेटिक बीमारी है जिसमें लंग्स में अपने आप कफ बनता रहता है। जिसके प्रभाव से फेफड़े धीरे धीरे संक्रमित होते रहते हैं। और आखिर में उन्हें बदलने के अलावा कोई और चारा नहीं बचता। यह बीमारी डाइजेस्टिव सिस्टम को भी प्रभावित करती है।
इन्फ्लुएंजा से हुई बीमारी की शुरुआत: पिछले साल अप्रैल में मेलिसा को इन्फ्लूएंजा हुआ। उसे साँस लेने में तकलीफ होने लगी। मेलिसा को आईसीयू में रखा गया। कुछ दिनों तक आईसीयू में रहने के बाद उसके फेफड़ों में बैक्टीरिया पनपने लगे जिन पर किसी एंटीबायोटिक का असर नहीं हो रहा था। उसके ऑर्गन्स काम करना बंद कर रहे थे। वो वेंटिलेटर पर थी। डॉक्टरों के अनुसार ट्रांसप्लांट ही एकमात्र विकल्प बचा था।

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सिर्फ एक परसेंट थी बचने की उम्मीद: टोरेंटो जनरल हॉस्पिटल के लंग ट्रांसप्लांट प्रोग्राम के डायरेक्टर डॉ शाफ केशवजी ने बताया कि, ‘ हमें पता था कि डोनर मिले बिना लंग्स हटाना रिस्की है। लेकिन शरीर में इन्फेक्शन फैलने से रोकने का यही एक तरीका था। हमने मेलिसा के परिवार को भी बता दिया था कि उसके बचने की उम्मीद सिर्फ 1 पेरसेंट है। तकनीकी तौर पर देखें तो वो छह दिनों तक आर्टिफीसियल लंग्स, हार्ट और किडनी पर जिन्दा थी। इस ऑपरेशन में हमारी टीम के सबसे अच्छे डॉक्टर्स दिन रात लगे हुए थे। हमें खुशी है कि इस तरह के ट्रांसप्लांट की शुरुआत हमने की। हमने दुनिया को दिखाया कि ये भी एक तरीका है।’

जर्नल ऑफ थोरेसिक एंड कार्डियोवेस्कुलर में प्रकाशित हुई केस रिपोर्ट: मेलिसा कहती हैं, ‘मैंने जब ट्रांसप्लांट की कहानी सुनी तो एकबारगी तो यकीन ही नहीं हुआ। ये सब साइंस फिक्शन जैसा लगा। डॉक्टर मुझे मौत के मुँह से वापस खींच लाये।’ मेलिसा के केस और इस ट्रांसप्लांट के बारे में सर्जिकल टीम की रिपोर्ट जर्नल ऑफ थोरेसिक एंड कार्डियोवेस्कुलर पत्रिका में प्रकाशित हुई है।

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