स्वच्छ भारत अभियान- एक सोच एक आंदोलन

स्वच्छ भारत अभियान

2 अक्टूबर 2014 को वर्तमान प्रधानमंत्री माननीय श्री नरेंद्र मोदी जी ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के जन्मतिथि पर स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत की थी।
बापू ने आजीवन अपने आस पास के लोगो को स्वच्छता बनाये रखने का उत्कृष्ट सन्देश दिया था।

ऐसा नहीं है कि इस से पहले कोई भी सरकार या संस्था ऐसी कोशिश या ऐसी सोच के साथ नहीं आयी थी परन्तु इस बार 2 अक्टूबर 2014 का दिन कुछेक मायनो में बिलकुल अद्भहुत था क्योंकि पहली बार किसी प्रधानमंत्री ने पूरे देश का आवाहन किया था और पुरे देश से पूरी जनता से अपील की वो इस अभियान से जुड़े और अपनी सहभागिता सुनिश्चित करे जिसके परिणाम स्वरूप स्वच्छ भारत अभियान एक वैश्विक अभियान बना और पूरा देश उनके साथ हो गया।

सरकारी महकमे से लेकर निजी महकमा तक, अमीर से गरीब तक, अफसरों से नौकरों तक, स्वर्णो से दलितों तक
सारे आपसी भेद-भाव भुला के इस अभियान में साथ हो लिए जिसका अपेक्षाकृत उचित परिणाम भी आया और हमारा देश पहले की तुलना में एक हद तक स्वच्छ भी हुआ।

प्रधानमंत्री के आवाहन के सर्वप्रथम हम अपने आस पास की स्वच्छता की जिम्मेदारी पूर्णता तो नहीं कहूंगा परंतु काफी हद तक सफल भी हुयी।।

दफ्तरों में,विद्यालयों में, महाविद्यालयों में, कारखानों में, उत्पादन इकाइयों में, हर जगह इस अभियान का बहुत ही उत्साहजनक परिणाम देखने को मिला बड़े-बुजुर्ग युवा महिलायें युवतियां, समाज का हर तबका इस अभियान को सफल बनाने में और इस अभियान में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने को तत्पर दिखा।

सारे लोग शर्म और संकोच, लाज और लिहाज़, आपसी भेद-भाव को त्याग कर पहली बार देश के लिए कुछ करने को आतुर दिखे, देश के लिए कुछ जिम्मेदार दिखे।

बच्चपन में जब मैं शायद छठि या सातवी में था तो पढ़ा था “हम समाज से है और समाज हम से” पर शायद मुझे लगता है कि हमें ये तो आज भी याद है कि हम समाज से है पर शायद हम ये भूल चुके है कि समाज भी हम से है, ये समाज हमारे समानांतर है।
हमने बच्चपन में पढ़ा था और कही न कही दृढंनिश्चय किया था कि हम इस समाज के सामाजिक नागरिक बनेंगे और समाज के पूर्ण निर्माण के साक्षी बनेंगे पर क्या हम आज अपने उस निश्चय पर खरे उतर पा रहे है, क्या हम उस समाज को उतना दे पा रहे है जितना हमने लिया इस समाज से।

आज अगर हम शोध पर बात करे तो हर साल 56 ट्रिलियनमेट्रिक कचड़ा हमारे देश से उत्सर्जित होता है जिसमे हर प्रकार की कचड़े होती है, क्या हमने यही तय किया था समाज को बदले में देने की।
आज अगर हम विकाशशील देशों में शामिल है, तो आइये बात करते है विकशित देशों की
सबसे पहले जापान मात्र कुछ एक करोड़ की जनशंख्या वाले इस बहुत ही छोटे से देश ने 2-2 परमाणु हमले सहने के बाद भी जितनी तरक्की की वो काबिलेतारीफ है।
विश्वशक्ति अमेरिका भी कभी अंग्रेजों का 200 बर्षो तक गुलाम था वो भी आज विकशित देशों में से एक है।
ऐसे बहुत से उदाहरण मिल जायेंगे परंतु हम आज कहा है मायने ये रखता हैं।
आज हमारे पास इतने संशाधन है पुरे विश्व का सबसे बड़ा जलभंडार हमारे पास है हम सबसे बड़े भूभागों में से एक है
हमारी खनिज़ संपदा भी काफी अच्छी है हम प्राकृतिक संसाधनों के मामले में भी बहुत ही अच्छी स्थिति में है, फिर भी हम सबसे प्रदूषित, सबसे गरीब, सबसे पिछड़े, सबसे क्रिमिनल एक्टिविटीवाले देशों में है! ऐसा क्यों?

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क्या आज का भारत वही चंद्रगुप्त विक्रमादित्य की सोने की चिड़िया, समुंद्रगुप्त की अजेय दुर्ग, चंद्रगुप्त मौर्य की अटूट देश, महान अशोक की धर्मप्रधान, महान अकबर की सर्व-धर्म सम्मान, सरदार भगत सिंह की युवा सोच, राष्ट्रपिता का रामराज्य और अम्बेडकर की स-सम्मान सोच वाली भूमि है!
हम आज कहाँ से कहाँ पहुँच चुके है, ये हमे और आपको सोचना है।।

अगर आज नहीं तो आखिर कब? क्यों? और कैसे?

तो आज भी हम ज्यादा पीछे नहीं है आज भी हम हारे नहीं है आज भी हमारी हिम्मत टूटी नहीं है आज भी हम साथ है

तो क्यों न हम आज से शुरुआत करे अभी से शुरुआत करे एक नए कल की ओर चले एक नए उज्जवल भविष्य की ओर कदम रखें, अपने आने वाली पीढ़ियों को और कुछ नहीं तो एक अच्छी मातृभूमि ही विरासत में दे जाएँ।

तो आज मैं आप सब से यही कहूंगा आओ हम साथ मिल कर एक सपना देखे स्वच्छ और मजबूत भारतभूमि, जो कश्मीर से कन्याकुमारी तक, एक हो नेक हो, सपना हो अपना हो, जय हिंद जय भारत।

जन जन का नारा है
सबसे प्यारा मातृभूमि हमारा है।।।

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मैं नेता नहीं हूं फिर भी अच्छी बात करूँगा बदलाव मैं अकेले ला नहीं सकता पर बदलाव की मसाल बनूँगा रास्त्रवादी नहीं फिर भी तन मन धन अर्पण कर जायूँ किसी की जान ले न पायु पर अपनी जान बलिदान कर जायूँ एक छोटी सी कोशिस है छोटी सी आशादूर कर जायूँ मातृभूमि का अन्धकार और निराशा

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