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बेली रोड पटना में तेज रफ़्तार कर गड्ढे में गिरी तीन छात्रों की मौत|सुबह सुबह जब इस हादसे की खबर पढ़ी तो मेरे आँखों के सामने मेरी माँ की वो बेचैनी भरी तस्वीर सामने आने लगी जब मैं साइकिल से गिर पड़ा था| मेरे कमर में चोट लगी थी और दर्द भी बहुत ज्यादा था| अब रात होने वाली थी और गावं से रात में कोई साधन न हो पाने के कारण डॉक्टर के पास जाना मुश्किल था| मेरी माँ रात भर बेचैन और जगी रही और लोगो के द्वारा बताये हुए तरह तरह की नुख्शो को आजमाती रही| वो इस कदर बेचैन और तड़प रही थी मनो कोई साँस रोकने के लिए उनके मुख पर तकिया रख दिया हो| ये सोचते सोचते कब एक बूंद अंशु अख़बार के उस खबर पर गिरी मुझे पता नहीं चला|

माँ एक ऐसा शब्द जो अपने आप को अपने बच्चों के लिए कुर्बान कर देती हैं| एक खरोच भी उसके लाल को आ जाये तो तड़प सी उठती हैं|

जब मैं भावनाओ को समझने या यूँ कहिये की जब मुझमे दुसरे की पीड़ा समझने की शक्ति आ गयी तो अब मैं अपनी माँ की वो हालत समझ सकता हूँ| अब तरुष राजवीर और साकेत की माँ का दर्द मुझे महसूस हो रहा हैं|

और सभी माओं की तरफ से एक कविता आप सबको समर्पित करना चाहता हूँ|

याद आता तेरा मुश्कुरता वो चेहरा अंचल पकड़ के मानना वो तेरा

लगाया तिलक भाल पे जन्मदिनी नहीं काम आया दुआओं का जखीरा

हमें छोड़ के तुम कहा चल दिए हो अश्को के सागर में मुझको गिरा कर

कैसे जिउ तेरे बिन मेरे लाला अपने अमूल्य दौलत को भुलाकर

अभी भी तो उठकर मुझको पुकारो पोछ कर मेरे आंशु मुझको हंसा दो

नहीं डाटते तेरे पापा मैं कहती होती हैं देरी मैं उनको बताती

पर गाड़ी तू थोड़ी धीमी चलता बैठी थी मैं तेरा रास्ता निहारे

ये कैसा सितम दे दिया मुझको रब ने सालों की ख़ुशी अब बदली हैं गम में

अँधेरा हुआ मेरा घर था जो चमकता तुम्हरी हंसी से हर कोना महकता

अब किसे डाटूंगी मैं थप्पड़ लगाके किसको छुपाऊ अंचल में बुलाके

लगता हैं जिन्दा मर सी गयी हूँ तुझे खो के प्यारे तड़प ही गयी हूँ

मेरे देवता तुम मेरी जान ले लो लौटा दो मुझको मेरा प्यारा लल्ला

अब ऐसी खता मैं फिर न करुँगी रखूंगी मैं उसको तिजोरी में संभाले

मुझपे तो इतना रहम कर दो भगवन दे दो मेरा लाल मेरा चेहरा खिला दो

आप सभी इस कविता की विडियो भी इस लिंक पर जाकर देख सकते हैं|

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