लिपस्टिक अंडर माय बुर्का

प्रकाश झा के द्वारा निर्मित और अलंकृत श्रीवास्तव द्वरा निर्देशित फिल्म “लिपस्टिक अंडर माय बुर्का ” एक बार सेंसर के कठघरे में खड़ी हैं|सेंसर बोर्ड ने इस फिल्म को सर्टिफिकेट देने से मना कर दिया| मन जाता हैं की ये फिल्म मौजूदा “तीन तालक ” जैसी नियमो को आइना दिखने के लिए बनायीं गयी हैं|प्रकाश झा मुख्यतः ऐसी ही फिल्मों के लिए जाने जाते हैं|और सेंसर बोर्ड से उनका पहला पंगा नहीं हैं| फिल्म गंगाजल के समय भी उन्हें ऐसी हालातों से गुजरना पड़ा था|

फिल्मे समाज की दर्पण होती हैं और अगर सेंसर बोर्ड ऐसी फिल्मों जो समाज का पूरी तरह चित्रण करती हैं को बढ़ावा नहीं दे तो इसका एकदम सीधा मतलब ये निकलता हैं की हम अपने रस्ते से भटक गए हैं| फिल्म उधोग सिर्फ पैसा कमाने की जगह रह गयी हैं वो अपनी समाज के प्रति उतरदायित्व को भूल चुकी हैं| कुछ अच्छे लोग समाज के लिए कुछ करना चाहते हैं समाज को कुछ देना चाहते हैं उन्हें भी नियमो के रस्सी बांध कर रोका जा रहा हैं|


अजीब विडंबन हैं,अप्प समाज के उसी चीज को अख़बार में देख सकते हो लेकिन फिल्मों में दिखाई जाये तो तो आप उसका विरोध करते हैं| आजकल की पीढ़ी इतने इतनी तेज गति से ऐ बढ़ रही हैं की उनके पास अच्छी किताबें उपन्यास पढने का समय नहीं हैं,जिससे वो जिन्दगी को सिख सके और बाकि सिखने की दूसरी चीज बची वो हैं फिल्म जिससे लोग कम समय में अधिक चीज जान सकते हैं| लेकिन आज की दौर के फिल्मों का अजीब हालत हो गयी| सिर्फ ऐसी फिल्मों को ही बनाया जा रहा जिससे कमाई हो सके|

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मुझे ये समझ में नहीं आता अगर “लिपस्टिक अंडर माय बुर्का ” जैसी फिल्म समाज को दिखने लायक नहीं तो फिर कैसे कुछ भोजपुरी फिल्मों को सर्टिफिकेट मिल जाता हैं बिना किसी विवाद के| प्रकाश झा की और सब फिल्मों की तरह ये फिल्म भी कुछ अलग और समाज का एक सही चित्रण करने वाली होगी| अगर समाज असंस्कारी हो गया हैं तो वो भी समाज के सामने रखना चाहिए और उसे अपनी संस्कारिता नष्ट होने का आभास दिलाना चाहिए|

अभिषक गोस्वामी

(ये मेरे अपने विचार हैं )

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