हिन्दू पर्वो पर दोगलिनीति की मार:- नतीजा श्रद्धालुयों की मौत

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मकर सक्रांति की सारी खुशियां देर शाम ढले ही गहरे दुःख में बदल गयी जब संध्या में ये खबर मिली की
गंगा दियारा से पतंगवाजी के बाद संध्या पहर बापसी में 70 लोगो से भरी हुई नाव NIT घाट के समीप ही डूब गई।उन 70 डूबने वालों में से 27 लोगो के शव अभी तक निकाले जा चुके है और काफी लोग अभी भी लापता बताये जा रहे है।

आपको बता दू के मकर सक्रांति के शुभ अवसर पर बिहार पर्यटन विकाश निगम की ओर से गंगा दियरा मे पतंगोत्सव का आयोजन किया गया था जिसमे हज़ारों की तादाद में लोग दियारा पर पतंगवाजी का लुफ्त लेने पहुचे थे।

जाते समय तो सुरक्षा के पुख्ता इंतज़ाम किये गए थे, हर घाट पर NCC कैडेटों की तैनाती, साथ में पुलिस सुरक्षा बल भी पूरी मुस्तैद थी पर जैसे जैसे समय गुजरता गया ये इंतज़ाम भी ढीली पड़ती गयी जिसका खामियाजा संध्या के पहर 27 लोगो को अपनी जान गवा कर भुगतना पड़ा।

कहने को तो हमारे प्रधानमंत्री मान्यनिये नरेंद्र मोदी जी ने केंद्र सरकार की ओर से मृतको के परिजनों को 2 लाख रूपए की आर्थिक मदद और गंभीर रूप से घायलों को 50 हज़ार की आर्थिक मदद देने का एलान किया है

पर इस अहम् मुद्दे पर अभी तक उस निक्कमी राज्य सरकार की ओर से कोई भी आधिकारिक ब्यान या घोषणा नहीं की गयी है जो प्रकाशपर्व के सफल आयोजन पर अपनी पीठ खुद थपथपाने और अपने मुंह मिया मिट्ठू बनने से कही भी पीछे नहीं था।

आज शायद मुख्यमंत्री नितीश कुमार जी दही-चुड़ा खाने में ज्यादा व्यस्त थे या शायद प्रकाशपर्व की सफलता की योग निद्रा में लीन थे, जो शायद यह भी भूल गए के भारतवर्ष में मुस्लिमो,यहूदियो और शिखो से भी परे एक और कौम है,, और उस कौम के भी कुछ अपने पर्व-त्यौहार है जिन्हें सुरक्षा-पूर्वक करवाने का जिम्मा भी मुख्यमंत्री और उनकी राज्य सरकार की होती है पर सदैव की भांति इस बार भी हम हिंदुयों के साथ दोहरा व्यवहार किया गया जिसका परिमाण सामने है और पटना प्रदेश की ही बात की जाएँ तो मकर-सक्रांति में अलग अलग जगहों पर करीब 62 मौत हुई और पूरे बिहार प्रदेश में करीब 118 लोग काल के गाल में समां गये।

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सुबह तक जो पुलिस वाले और NCC कैडेट सड़कों पर तैनात किये गए थे वो लोग शाम होते होते कही गायब से हो गए और परिणाम आपके सामने है, अगर सरकार की ओर से घाटों पर सही मायनों में बचाव दल की तैनाती की गयी होती और गोताखोर और तैराक घाट पर होते तो शायद मृतको कक संख्या काफी कम हो सकती थी। घटनास्थल पर NDRF की टीम एक घंटे देर से आयी और SDRF की टीम तो नदारद ही थी।

चलिये आपको थोड़ा पीछे ले के चलता हूं 6 नवम्बर 2016 छठ महापर्व की प्रथम संध्या अर्घ्यं मनेर में करीब 49 छठव्रतियों से भरी हुई नाव बिच गंगा में पलट गई जिसमें करीब 29 लोग मृत और 9 लोग लापता, दानापुर शाहपुर घाट दियारा पर 82 श्रद्धालु से भरी हुई नाव घाट से मात्र 20 मिटर की दूरी पर डूब गई, और हर घाट पर की छिट-पूट घटनाओ में करीब 100 से ज्यादा मौत, और थोड़ा पीछे चलते है छठ महापर्व 2015, घाट पर भगदड़ में करीब 85 मौत और 200 से ज्यादा श्रद्धालु घायल।

ये आकड़ें दिखा के मैं आपके और अपने गम ताजा नहीं कर रहा हु वल्कि मैं पूछना चाहता हु के क्या इन त्योहारो में सुरक्षा की व्यवस्था करना राज्य-सरकार की जिम्मेदारी नहीं है?

क्या क्रिसमस, ईद, बकरीद, रमजान, प्रकाश-पर्व को ही सुरक्षित और सफलता-पूर्वक करवाने की जिम्मेदारी हमारी सरकार की है, बस इसलिए क्योंकि वो निम्नवर्गीय लोगो का त्यौहार है और वो लोग वोट-बैंक बनेंगे सरकार के?

ईद और रमजान के मौके पर सारे मोहल्लों में सारे नुक्कड़ों पर पुलिस बल की तैनाती की जाती है और कहा जाता है कि सुरक्षा के मद्देनजर व्यवस्था करनी पड़ती है कही दंगे न हो पर जब बात यही होली और छठ जैसे हम हिंदुयों के पर्व की आती है सरकार हाथ पर हाथ धर कर बैठ जाती है।

अभी पिछले सप्ताह समाप्त हुए प्रकाश-पर्व को ही लीजिए पुरे पटना में हर जगह सहायता केंद्र, मुफ्त बस का परिचालन, दानापुर से कंगन घाट तक बचाव-दल, हर घाट पर NDRF की टीम, घाटों पर प्रयाप्त संख्या में पुलिस बल और NCC कैडेटों की तैनाती, ये सारे इंतेज़ाम और हम हिंदुयों के पर्व पर बस खानापूर्ति??

आखिर क्यों??

अभी पंजाब में विधान-सभा चुनाब होने वाले है इस लिए, बस यही एक कारन था प्रकाश-पर्व की तैयारियों के पीछेऔर अगर हमारी सरकार और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी कहते है कि उनका ईद, बकरीद, रमजान और प्रकाश-पर्व पर की गयी तैयारियां निस्वार्थ थी तो फिर छठ और मकर सक्रांति पर मुख्यमंत्री और उनकी सरकार स्वार्थी क्यों हो गयी और सुचारू रूप से सुरक्षा-व्यवस्था क्यों नहीं की गयी पुरे सूबे में?

हालात ऐसे सिर्फ महापर्व छठ में और मकर-सक्रांति में ही ऐसे नहीं होते। हिंदुयों के हर पर्व में ऐसा दोहरा व्यवहार होता आया है, चाहे वो होली हो, दशहरा हो, दिवाली हो या रामनवमी हो और वही सारी ढीली व्यवस्था खुद बी खुद चुस्त-दुरुस्त हो जाती है ईद,बकरीद,और अन्य पर्वो पर।

मैं ये नहीं कहता और न ऐसा चाहता हु के सरकार इन पर्वो में भी अपनी मुस्तैदी छोड़ दे पर हां अन्य पर्वो पर भी उतना ही ध्यान दे और सुरक्षा-व्यवस्था मजबूत करे और निश्वार्थ भाव से हर समुदाय के पर्वो पर अपना फ़र्ज़ निभाए बिना किसी भेदभाव के।

अगर आज प्रकाश-पर्व की तरह सुरक्षा-व्यवस्था होती तो शायद आने वाले सालों में उनके भी घरों में मकर-सक्रांति उतने ही हर्षोलाश के साथ मनाया जाता जो न जाने आने वाले कितने बर्षों तक अभिशाप और कटु यादों के साथ दुःख में गुजारा जायेगा, किसी ने अपना पिता खोया,किसी ने माँ, किसी ने भाई, किसी ने जीवनसाथी।

भगवान् उन सभी मृतको की आत्मा को शान्ति प्रदान करे और उनके परिवार वालों को हिम्मत।

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