पठानकोट-हमला

2-5 जनवरी 2016, एक वर्ष पहले!

सारे लोग अपने अपने घरों में चैन से सो ही रहे थे की अचानक से टेलीविज़न पर समाचार आने लगे के पठानकोट स्थित हमारे वायुसेना कैंप पर तड़के सुबह आतंकवादियों ने हमला कर दिया और सोये हुए हमारे  जवानों पर अत्याधुनिक हथियारों से अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी जिस से हमारे 2 जवान भाई मौके पर ही शहीद हो गए  और 3 घायल जवानों ने बाद में अस्पताल में दम तोड़ दिया।

बाद में भारत सरकार द्वारा चलाये गए जवाबी करवाई में  सभी आतंकवाद मारे भी गए, पर क्या ये हमला उनकी जीत थी या हमारी हार?

किसी देश के वायुसेना कैंप में 6 आतंकवादी बर्दी में आते है और अंदर तक आ कर के हमला कर के हमारे जवानों को मौत की नींद सुला देते है। क्या ये एक प्रश्नचिन्ह नहीं है हमारी अत्याधुनिक सुरक्षा व्यवस्था पर? क्या ये हमारी चुक नहीं है कि कोई भी आतंकी हमारी सीमा में हथियार ले के प्रवेश कर जाता है?

हमलावर अपने साथ ग्रेनेड, 52 मिमि मोर्टार, एके राइफले और जीपीएस उपकरण ले आये थे।

ये आज कोई पहला हमला नहीं था जिसने हमे शर्मसार किया हो, इस से पहले भी ऐसे काफी सारे हमले किये गए जिसने हमे सोचने पर मजबूर किया है। 12 मार्च 1993 मुम्बई विस्फोट जिसमे 350 लोग मारे और 713 लोग घायल हुए थे, 30 दिसम्बर 1996 ब्रह्मपुत्र मेल ट्रैन बम विस्फोट, 14 फरबरी 1998 कोयम्बटूर बम विस्फोट जिसमे 58 लोग मारे और 278 लोग घायल हुए, मई-जुलाई 2000 चर्च बम विस्फोट, 22 दिसम्बर 2000 लाल किला पर हमला।

जिसने हमारी सुरक्षा तंत्र की पोल खोल दी पर हम तब भी नहीं चेते और उसके बाद 1 अक्टूबर 2001 जम्मू कश्मीर के विधानसभा में अंदर घुश कर आतंकवादी हमला जिसमे 38 लोग मारे और 100 से ज्यादा घायल हुए।

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उसके बाद देश को पूरे दुनिया में शर्मसार करती हुई 13 मई 2001 को हमारी पार्लियामेंट पर आतंकवादी हमला  जिसमे 7 लोग मारे और बहुत से घायल हुए।

इस हमले की भी पहले की तरह सिर्फ निंदा की गयी और हमारी हुकूमत फिर चैन से सो गई जिसके बाद हालात और बाद से बदतर होते गए और फिर से 2002 में जौनपुर एक्सप्रेस, मुम्बई बम ब्लास्ट और फिर 24 सितम्बर 2002 को  गुजरात के अक्षरधाम मंदिर पर आतंकवादियों ने हमला किया और हमे फिर से साबित किया कि हमारे जो सुरक्षा को ले कर के खोखले दावे है उन्हें वो हर बार गलत साबित करेंगे और हमारा सीना छलनि और हमारा जिगर खून खून करते रहेंगे।

2003 में मुम्बई बस,मुम्बई ट्रैन और भी लगातार अलग अलग जगहों पर धमाके कर के इन्होंने फिर से हमे कमजोर और गलत साबित किया।

उसके बाद 15 अगस्त 2004 को धीमाजी स्कूल आसाम में इन्होंने स्वतंत्रता दिवस समारोह के दैरान फिर से धमाका किया गया जिस से 18 मासूम बच्चे मौत के घाट और 40 से भी ज्यादा मासूम बच्चे घायल और अपाहिज हो गए। मैं तो जितना कसूरबार इन बच्चों की हालात का उन काफिरों को मानता हूं उस से ज्यादा कसूरबार हमारी ये निक्कमी और हरामखोर सरकार है उनकी इस हालत की।

उसके बाद फिर से 2005 में 28 जुलाई को जौनपुर में ब्लास्ट, 29 अक्टूबर को दिल्ली में श्रृंखलावध बम ब्लास्ट जिसमे 83 से ज्यादा लोग मारे और 300 से ज्यादा लोग घायल हुए।

सिलसिला यही नहीं थमा 2006 में 7 मार्च बनारस जिसमे लगातार 7 ब्लास्ट, 11 जुलाई को मालेगांव मस्जिद ब्लास्ट, इन हमलों में 246 लोग मारे और 630 लोग घायल हुए, इस मस्जिद हमले से एक बात और साफ़ हुयी के अब आतंकवादी मुस्लिमो को भी नहीं बख्श रहे थे।

पुन:, 2007 में भारत-पाकिस्तान को जोड़ने वाली समझौता एक्सप्रेस में 18 फरबरी को बम धमाकों से थर्रा दिया गया, इसके ठीक 3 महीने बाद 18 मई को मक्का मस्जिद धमाके हुए और फिर इसके बाद 11 अक्टूबर को अजमेर सरीफ में हमले कर के आतंकवादियों ने हमारी हुकूमत को निक्कमा और हमे कमजोर साबित किया और हमे सोचने पर मजबूर किया कि हम अपने धार्मिक स्थलों की भी सुरक्षा करने में नाकाम है।

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2008 में उत्तरप्रदेश धमाके,  13 मई को जयपुर में श्रृंखलावध 9 बम धमाके से और फिर 25 जुलाई को बंगलोर में एक के बाद एक कर के लगातार 8 बिस्फोट और उसके ठीक एक दिन बाद 26 जुलाई को।

अहमदाबाद में लगातार 17 धमाकों से हमारा तन और मन दोनों को भयभीत किया गया और फिर 13 सितम्बर को हमारी राजधानी को फिर से 5 धमाकों से थर्राया गया और उसके 14 दिनों के बाद हमारी राजधानी में फिर से 2 धमाके किये गए उसके बाद फिर से उसी साल 26 नवंबर को हमे ऐसा ज़ख्म दिया गया जो हमारे लिए नासूर साबित हुआ और फिर से मुम्बई आतंकवादी हमले में हमारे राष्ट्रीय अभिमान ताज होटल  को और उसमें आये काफी सारे विदेशी सैलानियों को मौत  के घाट उतार दिया गया, इस हमले ने हमे फिर से सोचने पर मजबूर कर दिया कि हम अपने देश में ही कितने सुरक्षित है और कितने आज़ाद है क्योंकि पूरा शहर 5 दिनों तक मौत के साए तले जीने को मजबूर था।

इस हमले ने हमारी सरकार को और हमारे ख़ुफ़िया तंत्र और हमारी सुरक्षा व्यवस्था को सरेआम बेइज्जत होने पर मजबूर किया और हमारी हुकूमत अपनी नाकामी का ठीकरा पकिस्तान पर फोड कर खुश थी। इस हमले के बाद सुरक्षा बजट भी बढ़ाया गया पर नतीजा वही ढाक का तीन पात साबित हुआ और फिर से 27 अक्टूबर 2013 को पटना बम धमाका और 2 जनबरी को पठानकोट हमले जिसमे आतंकी हमारे सीमा को पार कर के हमारे बेस कैंप के भीतर तक घुश आये, उस वक़्त क्या कर रही थी हमारी सरकार और हमारी ख़ुफ़िया तंत्र।

हमे लगा माहौल यहाँ सुधरेगा और सरकार सख्त होगी पर नहीं सरकार यहाँ भी नहीं चेती और आतंकियों ने हमारी सुरक्षा व्यवस्था को फिर से ठेंगा दिखाते हुए 18 सितंबर 2016 को उडी में तड़के सुबह हमारे सोते हुए जवानों को मौत के घाट उतार दिया, इसके बाद फिर से 3 अक्टूबर को बारामुल्ला जम्मू-कश्मीर और फिर 6 अक्टूबर 2016 को हंडवाना जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रीय राइफल्स पर आतंकी हमला कर के हमारे हथियार तक लूट गये। यहाँ भी हमारी सरकार और हम कुछ नहीं कर पाए सिवाए घटना की निंदा करने और सड़कों पर उत्तर कर मोमबत्ती जलाकर,गुलाब दे कर और मृतकों की आत्मा की शान्ति के लिए प्राथना करने के अलावा।

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मैं आज एक साल के बाद ये सवाल खड़ा कर के ये साबित नहीं करना चाहता हु के मैं एक सच्चा राष्ट्रवादी हु पर फिर भी मैं अपने सरकार, अपने हुकूमत और अपने जनता से ये पूछना चाहता हु के क्या हमारे जवान भाइयों ने ठेका ले रखा है हर बार अपनी जान कुर्बान करने का अपने देश पर और बदले में उन्हें मिलती है तो क्या कुछ चांदी और पीतल के मैडल और पुरूस्कार तथा चंद रुपये जो भीख सी लगती इनके बलिदानों के ऊपर।

फिर भी मैं आज जानना चाहता हु के क्या हम इतने हमलो के बाद सचेत हुए है और जागे है और खुद को सुरक्षित रखने का कोई भी कदम उठाया है? क्या हम अब सुरक्षित दायरे में है या हम अब भी डर डर के जीने को मजबूर है?

आज भी कोई माँ,कोई बीवी अपने बच्चों को, अपने शौहर को बहार भेजते हुए भगवान् से उनकी सलामती की प्रार्थना करती है। आखिर कब तक?

क्या हमारी सरकार और बिपक्ष इस मामले पर साथ आके कोई कड़े कदम नहीं उठा सकते है?

क्यों किसी आतंकी को भी हम अपने जेलों में दामाद की तरह रखते है और उन्हें दुबारा से आज़ाद हो कर फिर से खून की होली खेलने का मौका देते है? क्या आज हम परमाणु-शक्ति देश होते हुए भी अपने लोगो की रक्षा करने में नाकाम है??

क्यों बार बार हम अपने लोगो को बलि चढ़ने दे रहे है?

आज उस हमले के एक साल बाद भी हम किसी ठोस फैसले पर नहीं पहुच पाये है, न हमारी ख़ुफ़िया तंत्र इतनी सक्षम है कि हमले के पहले हमलो को नाकाम कर पाए।

अगर हम इतने नाकाम है तो आखिर क्यों????

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मैं नेता नहीं हूं फिर भी अच्छी बात करूँगा बदलाव मैं अकेले ला नहीं सकता पर बदलाव की मसाल बनूँगा रास्त्रवादी नहीं फिर भी तन मन धन अर्पण कर जायूँ किसी की जान ले न पायु पर अपनी जान बलिदान कर जायूँ एक छोटी सी कोशिस है छोटी सी आशादूर कर जायूँ मातृभूमि का अन्धकार और निराशा

3 COMMENTS

  1. First of all i would like to thank you for such a beautiful blog. Well drafted heart touching.
    Attack of Pathakot and Uri was realy a black chapter in the indian history and we should learn fron them. And I personally think that there was some leak which helped them to achieve their goal. And finally AK he is a big a.s h..e and I don’t want to waste time on him. All the best Kunal……

    • बहुत बहुत शुक्रिया भैया

      गलतियां हमने की है
      सुधार भी हम करेंगे

      बदलाब हम लाएंगे

  2. बहुत बहुत धन्यबाद भैया
    मेरा सवाल बस यही था कि क्या हम जाग रहे है और जो गलतिया हमने की है क्या हम उन गलतियों को सुधारने को तत्पर है??
    और जिस AK की बात आपने की भैया वो भी हमारी गलती का नतीजा है और हम सुधारेंगे अपनी गलती भैया

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